Tuesday, July 25, 2017

अधुरे ख़्वाब

कुछ अधुरे ख़्वाब ऐसे
कुछ अधुरे जवाब जैसे
कभी रातें रूठ जाये
कभी बातें लूट जाये
कई ख्वाहिशें है
कई रंजिशे हैं
कुछ साजिशे हैं
सुखी बारिशों में
भीगी बंदिशे हैं

कुछ अधुरी लिखी खतियाँ
कहीं अधुरी बुझी बत्तियाँ
ये लफ्ज़ बोल ना पाये
रोशनी में चल ना पाये
सूखे है यह नैना
अंग ना है चैना
खनके ना कंगना
खामोशियों मे
बीत जाये रैना

हम कहीं खो गये हैं
खुद ही खुद में सो गये हैं
नाकाम है सभी दुआएं
बेअसर है सब दवाएं
सपनों से दूर
थोडा बेकसूर
भटका ज़रूर
तबदील हुआ है
मेरा सुरूर