Thursday, November 17, 2016

क्या एक बार फिर मिलोगी?

चाँद तले दो नैन जले, बुनते कुछ यादें हम चले
उन रातों को रोशन करने क्या एक बार फिर मिलोगी?

फिसलते कदमों को सहारा देती फिसलती उंगलियाँ
हाथ थामकर बाहें खोली हसीन सिसकियाँ
छाँव तले कंधे पर सर रखे मुस्कुराती तितलियाँ
उस रंगीन महफ़िल में शामील हुई पेड़-पत्तियाँ
तेरी हसीं की गूँज मे झूम उठी वो शाम हसीन करने 
क्या एक बार फिर मिलोगी?

बिन बोले लफ्जों में सुलगती कहानियाँ
किनारे पर रेत में बिखरी मदहोश मस्तियाँ
तेरे होठों पर मीठे गीतों की सुरीली फुलझड़ियाँ
बारिश की बूंदों में भीगी नर्म-गर्म खामोशियाँ
महकती बाहों मे लिपटे उन अनगिनत पलों को जीने
क्या एक बार फिर मिलोगी?

बाली संग झुमती तेरी नटखट मुस्कान
डाडा की बातें रंग लाये हर शाम
झुल्फों में फसा मेरा खुला आसमान
तेरी गोद में पुरे हो जाये हर अरमान
अनगिनत बेतुकी बचकानी बदमाशियां करने
क्या एक बार फिर मिलोगी?

(अंजना भट्ट की माँ....क्या एक बार फिर मिलोगी? से प्रेरित)

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