Wednesday, November 23, 2016

अब तक खफ़ा है मुझसे?

बातों ने कैसी की रूसवाई
जुंबिशों में बसी बेवफ़ाई
रातों ने चुरा ली परछ़ाई
मेरा यार खफ़ा है मुझसे

चाँद सितारों की महफ़िल में आधे अधुरे ख्वाब थे
सवालों में उलझे कुछ टूटे फूटे जवाब थे
तेरी रफाकत में हम भी कभी नवाब थे
यूं मुँह मोड़ के तुम किस गली चल दिये
मेरा यार खफ़ा है मुझसे

न जाने किस लम्हे ने की गुस्ताखी
गिर पड़े पल, जरा सी आवाज़ भी न की
चींखती खामोशी कोमल हाथों पे रखी
धीमें कदमों से किस शहर तुम चल दिये
मेरा यार खफ़ा है मुझसे

चल पड़े हैं इस खलिश को साथ लेकर
हर क़ुरबत को तनहा छोडकर
खुद से लड़ झगडकर, सायों से झुंझकर
हर गली, हर शहर तुझे ढूंढने
यार, अब तक खफ़ा है मुझसे?

इस कदर है तेरी आदत
के तेरी महकती सांसो में खो जाना है इक रिवायत
तेरी खामोशी से है वीरान इस दिल की रियासत
बेचैन धडकनोंं की है ये अनजान सियासत

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