Sunday, September 11, 2016

रवानी

बिखरेे पल है
बिगडी गल है
बरबाद सुरों मे
बिछडे कल है

कुछ पल हारे हैं
बरसते अंगारे हैं
खामोश सरगम मे
गुमसुम सितारे हैं

ढिली सी जुलाहें है
दर्दभरी आहें है
अनगिनत करवटों मे
बेचैन निगाहें है

अधुरी कहानी है
रूठी जुबानी है
कांपते होठों संग
असुवन की रवानी है

न अंदर है न बाहर है
उधडा उधडा सा शहर है
खुद मे ही तू खोया है
खुली आँख जग सोया है

5 comments: