Friday, July 29, 2016

अंदरूनी

आखों मे क्यों नमी है
सपनों की क्या कमी है
जिंद़गी बडी प्यारी है
अपनी ही ये जमीन है

गुज़रा हुआ वक्त बीत है
बहती हवा तेरा मीत है
किसको पता, अब तू ही बता
मंजिल मिले ऐसी रीत रे

बिखरे ख्वाबों को समेट ले
उझडे बागों को सवाँर ले
थोड़ा मटक, जमी धूल तू झटक
गम की बूंद़ों को निगल ले

अरमानों की फैली क्यारियाँ
मंडराये उम्मीदों की परियाँ
जुगनू जुटा, जरा रोशनी लुटा
होठों पे सजे मीठी लोरियाँ

ढूंढे बाहर किसको यह नजर
चलता रह राही तू इस डगर
अंदर तू झाँक, थोडा रूह को भी ताक
तुझ को पुकारे शाम-ओ-सहर

1 comment:

  1. तुम्हारी मंज़िल जल्द मिलेगी।

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