Tuesday, July 19, 2016

झूठ

झुठा है जग सारा
इक पंछ़ी उड़ता हारा
पर अटक रहे
पैर झटक रहे
सुखी ड़ाली पर
ख्वाब लटक रहे
मंजिल ने मुँह पर मारा
थप्पड लाल करारा

आसमान को छूने, भर ली थी लंबी उडान
बाजू मे जोर भी था, और जेब मे खूब अरमान
मौसम का साथ न था, ना था अपनों का हाथ
राह ने जो मारी लाथ, रह गयी अधुरी बात

मक्कारों की है दुनिया
होठों पे बसते झूठ
मकडी की जाल मे फस के
सपनों की कर दी लूट
नकाबों की चद्दर तले
मिटाए जिस्म की भूख
दर्द की लहरों पर बिखरे
नकली मोतीयों के सुख

झुठी सारी रीत
झूठ मे सबकुछ चीत
झूठ से कैसे मिलती जीत
जब सच ही हो भयभीत

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