Wednesday, June 15, 2016

दानव

दोज़ख हूं मय मानव हूं
भीतर बैठा दानव हूं
ना राम बसा
न रहिम बसा
मत्त-उन्मत्त रावन है हसा

चीरहरण का जाल बिछ़ाये
चौसर पर फासे गिर जाए
दुर्योधन मैं
दुःशासन मैं
कपट-हरामी शकुनी भी मैं

भयभीत करूँ
सब चीत करूँ
ना रहम करूँ
जग खतम करूँ
कहीं घांव करूँ
कुछ राख करूँ
इक भीषण युद्ध
आरम्भ करूँ

चींखों का बज जाए डंका
खून की होली खेले लंका
सूं सूं करते बाण चले
तलवारों से चीर गले
हाथी-घोडे कुचल चले
धर्म की सेना उछ़ल चले, उछ़ल चले

भीतर का यह दानव है
उपर का यह मानव है
कभी दानव है
कभी मानव है

Tuesday, June 7, 2016

बचपन

हल्ला मचाये किसी आंगन की मिट्टी
खुशियों की गोली लिए नन्हीसी मुठ्ठी

गोली की बोली बतलाए मीठे सपने
कंचो की टक्कर मे मद़होश अपने

उड़ने की चाह लिए दौडे़ दिनभर
दा़दी की गोद़ ही क्यारी रातभर

चुस्की मे डुबती शामें अनगिनी
तारों मे छुपी पहेली अनसुनी

मांजे मे उलझा मासूम शोरगुल
बारीश की बूंदों मे हो गये हम चुल्ल

खरोंचो के द़ाग से झांकता बचपन
खट्टी इमली मे लिपटा बचपन
मिठी लोरियों मे गुंजता बचपन
जामून के पेड़ मे अट़का बचपन