Friday, May 27, 2016

सफर

न जाने ये कैसा तन्हा सफर है |
इक साया ही तो हमसफर है |

सुखे पत्तों पर बहके कदम है |
बौराई राहों पर गिरते हरदम है |
मैलों बिछी तीखे काटों की चद्दर है |
उसमे अटका बिखरा मुकद्दर है |
हाथ छोडे अपना सहर है |
जाने ये कैसा तन्हा सफर है |

कानों मे सन्नाटे की गूंज है |
आँखो मे टूटे सपनों के बूंद है |
होठों पे लफ्जों का तुफान है |
कंधों पर बोझ बना फटा आसमान है |
जख्मों पर मरहम बेअसर है |
जाने ये कैसा तन्हा सफर है |

ना मंजिल का ठिकाना है |
बीते वक्त का उधार चुकाना है |
नजर न आये रोशनी कहीं |
चल दिया अंधेरा वहीं |
गिरती-फिसलती बेइमान डगर है |
जाने ये कैसा तन्हा सफर है |

कहां से कहां को चला है |
सवालों का दरिया अंदर पला है |
अंगारों पर रखे नंगे पांव है |
कटे दिल पर गहरे घांव है |
छांव मे बसी हसीन कब्र है |
जाने ये कैसा तन्हा सफर है |

1 comment:

  1. ज़ख़्मो पर मरहम बेअसर है, जाने ये कैसा तनहा सफ़र है।

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