Friday, April 22, 2016

गौरैया

पलकों से ज़ब नींद़ टपकती
आँखों में सपने रंग भरते
पीपल की टहनी पर झपकी
लेती गौरैया की बस्ती

खुली चोंच़ पर दा़ने नाचे
बूंद़ बूंद़ से प्यास बुझाती
लुकाछुपी का खेल लगाती
फुद़क-फुद़क कर हस्ती-गाती

फुलों-पत्तों से उड़ जाती
घोस़ले को ठाट-बाट सजाती
तितलियों से दौड़ लगाती
नन्हीसी यह फौज शरारती

चूं चूं चूं कर गाती चीड़ियां
भटके बगियां पर्बत नद़ियां
एक ख़ेल ने बिगडी सद़ियां
खो गयी प्यारी गौरैय्या

फिरसे तू आंग़न मे आ जा
टहनी पर तू गाने गा जा
खिड़की पर झुले लगा जा
यूं हम से तू रूठ़ ना जा