Friday, January 15, 2016

लफ्ज़ नाराज़ है|

छा़यी उदासी आज है
मुरझा़ फुलों का ताज़ है
खुशियों पर गिरी गाज है
न जाने क्यों यह लफ्ज़ नाराज़ है

मन मे ही रो पडे यह लफ्ज
आसूं मे बह गये
जुबान पे लडखडाए यह लफ्ज
होठों मे फस गये

कलम भी सुखी पडी है कोने मे
दर्दभरा एहसास है उनके न होने मे
कैसे तेहरीर करें अब अदब
ना-हासिल है हसीन सिरा अफसाने मे

धूप की मासूम किरने ना-हासिल
टिमटिमाते तारें भी ना-हासिल
रंगीन सपनों की रातें ना-हासिल
तुफान मे फसीं कश्ती को साहिल ना-हासिल
थके पंछी़ को टहनी ना-हासिल
जिस्म को रूह भी हो ना-हासिल
राही को मंझिल हो ना-हासिल
प्यासे को पानी भी ना-हासिल

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