Friday, October 30, 2015

खोज

खोज का एक बोझ है
कंधेसे फिसलता हररोज है

भटक रहा राही हर गली हर मकान

उदास सा, बेचैन सा
जीत से दूर, खुदसे हारा, कुछ उखडासा
न उमंग है, न मौज है
बस खोज का एक बोझ है

चलता रहा दरबदर, अंजानसा खाली सफर

बस धूप है, न कहीं छाँव है
पैरों तले गहरे घाव हैं
मुश्किलों की फौज है
बस खोज का एक बोझ है

रोशनी की चाह है, काटोंभरी यह राह है

छाया घना अंधेरा, काले बादलों का डेरा
तकदीर की लकीर पे अनगिनत खरोज है
बस खोज का एक बोझ है

खोज का एक बोझ है

कंधेसे फिसलता हररोज है

6 comments:

  1. बा क्या बात है...! यकिनन खोज एक बोझ यह कल्पना किसी वास्तविकता से कम नही है. जीवन हम सब किसी ना किसी तलाश में गुजार देते है या मानो गुजार रहे है. उसके कई पेहलु हमें अंदर ही अंदर खोंकला कर देते है या प्रोत्साहित भी करते रहते है पर यह सब बोझ से कम नही है. ईस बोझ कि कई परिभाषाये है जिस में डर, कामना, एकांत, मेल मिलाप, हानी इन जैसी कई चिंताओसे हम सब घिरे रहते है.. आपकी इस रचना ने इन सभी का एहसास दिलाया और एक नया दृष्टिकोन मिला धन्यवाद.

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