Wednesday, July 8, 2015

खो बैठे

खिलौनोंकी चद्दर पर मस्तीयाँ थी बिखरी
नन्हीसी मुठ्ठी मे सपनों की मिसरी
बंद आँखें जो खुली
तो बचपन ही खो बैठे

मंजिल तो तय थी, रास्ते भी साफ थे
इरादे बुलंद और तैयारी के साथ थे
पर नजारों की गुस्ताखी मे
हम सफर ही खो बैठे

दिनभर मस्ती थी, यारोंसे कुस्ती थी
बेफिकर लहरों पर सवार वो कश्ती थी
दस्तूरी अंधेरो में
हम यारियाँ ही खो बैठे

कुछ खोना है, कुछ पाना है
चंद पल की जिंदगी में
दूर तक जाना है

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