Sunday, April 14, 2013

जिये तो कैसे?

एक बात है जान ली, जिंदगी अपने बस की बात नही, 
पर मौत कहती है, यह हस्ती मेरे बस की बात नही

खेल कोई भी हो, जीत के साथ अपनी नही बनती
पर हार की नजर मे अपनी नही गिनती

हादसा कैसा भी हो, हंसी अपने चेहरेपर नही सजती
आंसू की नदियाँ मूंह फेर कर चलती

न जाने यह सफर है कैसा, एक पैर रूकने नही देता
और दुसरा चलने नही देता

जिये तो कैसे जिये,
यह सांस जिने भी नही देती, और बुझने भी नही देती

Thursday, April 4, 2013

फिर से एक बार

चल पडा है राही फिरसे एक बार, मंजिल की खोज मे सागर के उस पार
राहों से है दोस्ती, तुफानों से मस्ती, तनहाई की कश्ती, लेकर उस पार

आखों मे रोशनी लिए, सपनों के जलते दिए, उम्मीदों का बेडा लगाने उस पार
चल पडा है राही फिरसे एक बार

बुस्दिलीको ठोक कर, मुश्किलोंको रोक कर, खुली सांस की नय्या लगाने उस पार
चल पडा है राही फिरसे एक बार

जख्मों से उभर कर, दर्द  से सुधर कर, प्रीत का झंडा लहराने उस पार
चल पडा है राही फिरसे एक बार

शोर-शराबा छोड कर, मारामारी मरोड कर, होठों पर मुस्कान लाने उस पार
चल पडा है राही फिरसे एक बार

Tuesday, April 2, 2013

पत्ते

सुखे पत्ते गिरते हैं|
नए उगते है|
गिरे पत्ते इक यादगार बन जाते है|
उगे पत्तोंकी खुशी मे सारा पेड झूम उठता है|
सुखे पत्ते बिखरी यादों की तरह खडे पेड को देखते रहते हैं|
हरे पत्ते खुशी से त्योहार मनाते हैं|
बिखरी यादें मातम मे खुशी के आसू बहाते हैं|
नए पत्तों को लेकर पेड नई जिंदगी जिने मे मश्गूल हो जाता है|
सुखे, बिखरे पत्ते सडसडकर नई जिंदगीयोंको मजबूत बना देता है|

पत्ते, गिरकर भी उभर आते हैं|
एक नए अंदाज मे|
एक नए रूप मे|
एक नई जान मे|

पत्ते, कुछ हरे, कुछ हारे|