Monday, March 25, 2013

गुफ्तगू

टूटते हुए तारे से हुई गुफ्तगू इक दिन
गिरते गिरते कह गया बातें वो अनगिन

बगल मे है अंधेरा और तुझ मे ही है रोशनी
सोच के बना खुद मंजिल तू अपनी

बुरा नही है अंधेरा
वो भी है तेरा अपना
अंधेरे मे ही तो रोशन होता है
हर किसी का सपना

जुगनू हो या हो दियाजलता तो हर कोई है
बुझना तो है सबको इक दिनपर उम्मीद  खोयी है

कितनी भी  क्यों ऊँचाई है पायी
भूल  जाना पास ही मे है खाई
िगरने का न हो मन मे भय कभी
िगरके उठने का यह मंत्र सीख ले अभी

िगरते िगरते भी न रख िकसीकी इच्छा अधुरी
बस, इसी को समझ ले तू अपनी कहानी पुरी

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