Friday, May 25, 2012

ना-मौजुदगी

बस, यहाँ से गुजर ही रहा था की सोचा तेरी खिडकी से झाँक लूं

तू तो थी नही पर तेरे कानों की बाली मिली
मेरे लफ्जों की ताजी गूंज उन में सुनी

बगल में तेरा मुलायम दुपट्टा फैला हुआ था
उसमे टंगी तेरी लिबास से सारा कमरा महक उठा

नीचे जमींपर पायलीयां बिखरी पडी थी
तेरे मटकने की झनक उनमे महसूस की

मेज पर कांच के रंगबिरंग कंगन रखे थे
तुम्हारी हाथों की कोमलता उनपर खिल रही थी

बहुत ढूंढा तुझे पर तेरी आहट भी न सामने आयी
हर शाम इसी तरह तेरी हसीन गली आता रहा 
और इस माहौल से सिर्फ तेरी ना-मौजूदगी लेकर जाता रहा



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