Friday, May 25, 2012

अंधेरे की खोज में

झगमगाती हुई रोशनी में वो ढूंढ रहा था इक कोना, छिपने के लिए
अंधेरेसे उसे लगाव और अकेलेपनसे बेहद प्यार

जमाने से अलग थी उसकी मिजाज और समाज से उलटे उसके अंदाज
"मिलते तो सभी है रू-ब-रू, पर होता नही कोई रूह-रू" एक मेहफिल में उसने कहा|
 न कभी किसी चीज की रखी ख्वाहिश न की नुमाईश|
लोग उसकी कदर करते थे, उसे मानते थे|
पर वो इस सबको दिखावा मानता था| उसे चाहिए था घना अंधेरा और गहरा अकेलापन|

बहोत देर तक वो उन किरनों से छुटकारा पाने की कोशिश में रहा|
जहाँ रोशनी का नामोनिशान न हो ऐसी जगह की तलाश थी उसे|
कई साल बीत गए, कई अर्से गुजर गए, पर रोशनी ने उसका पिछा नही छोडा|
बहोत सहने के बाद उसने ठान ली, इस रोशनी का उगमही खत्म कर देते हैं|
किरनों की और वो चला दिया, परछाई का अंदाजा लगाकर रोशनी की शुरूआत की और बढा|
ओज के संग चलते-चलते उसे एहसास हुआ की इसका स्रोत वो खुद है|
खुदकी रूह से निकली किरनें उसे अनगिने, अनसुने सवालों के जवाब दे गए|

अब वो एक शांत साधू के नाम जाना जाता है|

1 comment:

  1. Aree mast, unexpected ending. The twist is really nice

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