Friday, May 25, 2012

ना-मौजुदगी

बस, यहाँ से गुजर ही रहा था की सोचा तेरी खिडकी से झाँक लूं

तू तो थी नही पर तेरे कानों की बाली मिली
मेरे लफ्जों की ताजी गूंज उन में सुनी

बगल में तेरा मुलायम दुपट्टा फैला हुआ था
उसमे टंगी तेरी लिबास से सारा कमरा महक उठा

नीचे जमींपर पायलीयां बिखरी पडी थी
तेरे मटकने की झनक उनमे महसूस की

मेज पर कांच के रंगबिरंग कंगन रखे थे
तुम्हारी हाथों की कोमलता उनपर खिल रही थी

बहुत ढूंढा तुझे पर तेरी आहट भी न सामने आयी
हर शाम इसी तरह तेरी हसीन गली आता रहा 
और इस माहौल से सिर्फ तेरी ना-मौजूदगी लेकर जाता रहा



अंधेरे की खोज में

झगमगाती हुई रोशनी में वो ढूंढ रहा था इक कोना, छिपने के लिए
अंधेरेसे उसे लगाव और अकेलेपनसे बेहद प्यार

जमाने से अलग थी उसकी मिजाज और समाज से उलटे उसके अंदाज
"मिलते तो सभी है रू-ब-रू, पर होता नही कोई रूह-रू" एक मेहफिल में उसने कहा|
 न कभी किसी चीज की रखी ख्वाहिश न की नुमाईश|
लोग उसकी कदर करते थे, उसे मानते थे|
पर वो इस सबको दिखावा मानता था| उसे चाहिए था घना अंधेरा और गहरा अकेलापन|

बहोत देर तक वो उन किरनों से छुटकारा पाने की कोशिश में रहा|
जहाँ रोशनी का नामोनिशान न हो ऐसी जगह की तलाश थी उसे|
कई साल बीत गए, कई अर्से गुजर गए, पर रोशनी ने उसका पिछा नही छोडा|
बहोत सहने के बाद उसने ठान ली, इस रोशनी का उगमही खत्म कर देते हैं|
किरनों की और वो चला दिया, परछाई का अंदाजा लगाकर रोशनी की शुरूआत की और बढा|
ओज के संग चलते-चलते उसे एहसास हुआ की इसका स्रोत वो खुद है|
खुदकी रूह से निकली किरनें उसे अनगिने, अनसुने सवालों के जवाब दे गए|

अब वो एक शांत साधू के नाम जाना जाता है|