Wednesday, January 4, 2012

न जाने क्यों?

लाखों-करोडोंकी भीड में, अकेलापन क्यों?
खिलखिलाहटोंकी गूंजमें सुनापन क्यों?
जोशभरे माहौल में ऐसी उदासी क्यों?
खिलते चेहरेपर आसू की झलक क्यों?

रोशन हुए रास्तोंपे डगमगाते पैर क्यों?
अंधेरे मकानोंमें ढूंढती नजर क्यों?
सच्चाई के राह पर यूं झिझकना क्यों?
किए हुए वादोंसे यूं मुकरना क्यों?

मासूम चेहरे के पिछे बदमाशी क्यों?
शैतान के दिल में भी प्यार क्यों?
भरी मेहफिलमें सूरों का खो जाना क्यों?
अनजान राहीसेभी सूर मिल जाते क्यों?

अपनीही परछाईसे डर लगे, ऐसा क्यों?
सीधी बातोंसे टेढे मतलब निकले, ऐसा क्यों?
सबकुछ होते हुए भी कुछभी न होना, ऐसा क्यों?
कुछ ना होकर भी बहोत कुछ पाना, ऐसा क्यों?

अपनोंसे अपनापन पाने के लिए लडाई क्यों?
खुदही की परछाईसे जुदाई क्यों?
आसान सवालों के मुश्किल जवाब क्यों?
दिनदहाडे खौफनाक ख्वाब क्यों?

रिश्तोंको निभानेके लिए भावनाओंकी रिश्वत क्यों?
जवाबोंके लिए धरती-आकाश एक करनेवाले दिमाग में आखिरकार इतने सवाल क्यों?

1 comment:

  1. when are you posting the solution poem?


    yeh kaafi acha likha hai.

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