Tuesday, December 6, 2011

गया भाड में

जिसे देखो दिमाग की मारनेपे तुला है| ये किया?, वो क्यों नहीं किया?, इसका क्या मतलब है?, यह किसने कहा था?, मुझे क्यों नही बताया?, उसने ये कब कहा?, ये किसने दिया?...अबे रूक! सवालोंकी लॉटरी निकाल रहा है क्या| सास तो ले| और नही भी लेनी है तो दुसरों को ते ढंगसे जिने दे| उनकी सांसें क्यों रोक रहा है? लेकिन सुनना ही कहां है?
खुलके जिने की जैसे पाबंदीही लगायी है| पैसे कमानेके लिए, पेट भरने के कारन काम करना जरूरी है वो पता है| सब करते है और बचपनसे यही सिखाया गया है| बल्कि पुरा बचपन ये ही सिखनेमे बरबाद हो गया| खैर! पापी पेट का सवाल होता है| कुछ चीजें मजबूरन करनी पडती है| लेकिन इसका यह मतलब तो नही ना के दिमाग पे ही रोक लगा दी जाए| किसी की उडान को भले ऐसे कोई रोकता है क्या?
गया भाड मे| जो करना है कर ले, जो भी उखाडना है उखाड ले| ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, कुछ दिन भूखा रह जाऊंगा, इधर-उधर भटकूंगा, ठोकरें खाऊंगा, गालियोंको अपना बना लूंगा, खैर, कोई बात नही| लेकिन कम से कम दिमाग तो आजाद हो जाएगा| पर पता नहीं, अंदर ही अंदर एक जंजीर महसूस हो रही है| पैरोंमे लगी इस जंजीरने दिमागको गुलाम बना दिया है|
खुली हवामे सांस लिए एक अर्सा गुजर गया| पिछली बार हाथ-पैरोंको मनचाहा कब फैलाया था ये अब याद नही आ रहा| झुटी मुस्कुराहटोंकी भीड में जोर की हसींका जैसे दमही घुट गया| रोजकी भागदौड में मासूम दौडना गुम हो गया| चेहरेसे टपकती पसीनेकी बुंदोंमे आसू बह गया| पुरानी आदतों का गला घोट के नयी मजबुरींयोंको गले लगा लिया.........
(पता नही ये सब क्यों लिखा है....दरअसल ऐसा सोचाही क्यों है| लेकिन इससे एक बात साबित होती है, की सोच पे पाबंदी नही है|)