Tuesday, July 25, 2017

अधुरे ख़्वाब

कुछ अधुरे ख़्वाब ऐसे
कुछ अधुरे जवाब जैसे
कभी रातें रूठ जाये
कभी बातें लूट जाये
कई ख्वाहिशें है
कई रंजिशे हैं
कुछ साजिशे हैं
सुखी बारिशों में
भीगी बंदिशे हैं

कुछ अधुरी लिखी खतियाँ
कहीं अधुरी बुझी बत्तियाँ
ये लफ्ज़ बोल ना पाये
रोशनी में चल ना पाये
सूखे है यह नैना
अंग ना है चैना
खनके ना कंगना
खामोशियों मे
बीत जाये रैना

हम कहीं खो गये हैं
खुद ही खुद में सो गये हैं
नाकाम है सभी दुआएं
बेअसर है सब दवाएं
सपनों से दूर
थोडा बेकसूर
भटका ज़रूर
तबदील हुआ है
मेरा सुरूर

Thursday, June 1, 2017

गुमसुम


ख्वाबों की तलाश में हम घोसलें छोड आये
मंजिल पाने निकले, अपनी गलियां मोड आये

शतरंज की चाले चलने आँगन की मिट्टी छोड आये
आसमान में उड चले, अम्मा का आँचल छोड आये

ऊँचाईयों की ओर चले अपनों का हाथ छोड आये
तरक्की के चक्कर में यारों का साथ छोड आये

बेरहम दुनिया के वास्ते खुद को भूल आये
आँसूओं को छुपाने, हसीं के नकाब ओढ आये

चमकने की उम्मीद लेकर निकले थे
अकेला सितारा बनकर रह गये
लहरों पर सवार होने चले थे
तनहा नैया बन के डूब गये
बारिश की बूंदों में भिगे सारा जहाँ
बरखा में भी सूखे रह गये
सपनों को पूरा करते करते
घर से दूर आ गये

Thursday, March 30, 2017

खिलता जा

फुलों सा खिलता जा, खिलता जा
भवरों सा गुनगुना, गुनगुना

बगियन में सजे रंगों की होली
रंगों में भिगती कलियों की टोली
तितलियों से आखमिचोली
रंगों में घुलता जा मिलता जा

नदियों में बहता नीला पानी
बूंदों में लिपटी शामें सुहानी
लहरें जैसे बहती चाशनी
झरनों सा बहता जा मुडता जा

महफिल में बजे बन्सी सुरीली
शहनाई लाये सुरों की डोली
बंदिश छेडे मन की बोली
गीतों सा बंधता जा बनता जा

रतियां जगाये नैन कोई
प्रीत की रीत है जागे न सोयी
चांदनी संग है मीत रचाई
तारों सा गिरता जा फिरता जा

Tuesday, February 7, 2017

छानी में

सर्द मौसम की चपेट में
गर्द कोहरे की लपेट में
थरथरातें हाथों से
छानी में खोले मिठाई के खाली बक्से
कुछ ज़र्रे गत्तों के किनारों में फसे
उस पुरानी महक में खामोश सोये

ठंडी लहरों के लम्स से ठिठुरते ज़र्रे
उन से झाँकती-मुस्कुराती यादें
यादों में पले गर्म लम्हों की चिंगारियाँ
उन में सुलगते अधुरे कुछ वादे

ज़र्रों के इर्द-गिर्द मंडराती मुस्कराहटें
छानी में बिखरी कुछ गर्म हसरतें
कोहरे में छिपी हैरान करवटें
इतराती, शरमाती काली हसीन रातें
पायल की झंकार, झुमके की झनझन
चमचमाते मोती और खनकते कंगन
मिसरी सी बातें, खट्टी शरारतें
तिखी नज़रों में प्यार की बरसातें
मिट्टी का स्वाद, तितली की मुराद
गुल्लक में समाये नन्हे ख्वाब ज़िन्दाबाद
यारों की मस्ती, वादों से दोस्ती
कलियों संग झूमती मदहोश वो कश्ती

महफूज है इस बक्से में, 
मन के हर गलियारे में,
छानी की ठंडी फ़र्श पर, 
रूह के हर ज़र्रे में

Wednesday, December 7, 2016

कहानी

वो सपनें बोता रहा
वो यादें बुनती रही
वो चाँदनियाँ जोड़ता रहा
वो चाँद से जुड़ने लगी
उस रात ने कैसा जादू किया
एक कहानी रंगने लगी

हर लम्हा एक सैलाब था
हर पल भी बेताब था
हवाओं में थी कश्मकश
महकी-बहकी थी वो दिलकश
उस माहौल ने मदहोश किया
एक कहानी सजने लगी

वो आँखों में डूब गया
वो बातों में खो गयी
वो लफ़्जो में सुलगता गया
वो सुरों में पिघलती गयी
उस सरगम में तार छेड़ गयी
एक कहानी गुनगुनाने लगी

होठों पे थमीं कुछ बात थी
मध्धम चली चाँदनी रात थी
सीने में पला था एक शरार
एक सांस ने कर दिया आश्कार
बस, महक उठा सारा जहाँ
वो कहानी खिलने लगी

Wednesday, November 23, 2016

अब तक खफ़ा है मुझसे?

बातों ने कैसी की रूसवाई
जुंबिशों में बसी बेवफ़ाई
रातों ने चुरा ली परछ़ाई
मेरा यार खफ़ा है मुझसे

चाँद सितारों की महफ़िल में आधे अधुरे ख्वाब थे
सवालों में उलझे कुछ टूटे फूटे जवाब थे
तेरी रफाकत में हम भी कभी नवाब थे
यूं मुँह मोड़ के तुम किस गली चल दिये
मेरा यार खफ़ा है मुझसे

न जाने किस लम्हे ने की गुस्ताखी
गिर पड़े पल, जरा सी आवाज़ भी न की
चींखती खामोशी कोमल हाथों पे रखी
धीमें कदमों से किस शहर तुम चल दिये
मेरा यार खफ़ा है मुझसे

चल पड़े हैं इस खलिश को साथ लेकर
हर क़ुरबत को तनहा छोडकर
खुद से लड़ झगडकर, सायों से झुंझकर
हर गली, हर शहर तुझे ढूंढने
यार, अब तक खफ़ा है मुझसे?

इस कदर है तेरी आदत
के तेरी महकती सांसो में खो जाना है इक रिवायत
तेरी खामोशी से है वीरान इस दिल की रियासत
बेचैन धडकनोंं की है ये अनजान सियासत

Thursday, November 17, 2016

क्या एक बार फिर मिलोगी?

चाँद तले दो नैन जले, बुनते कुछ यादें हम चले
उन रातों को रोशन करने क्या एक बार फिर मिलोगी?

फिसलते कदमों को सहारा देती फिसलती उंगलियाँ
हाथ थामकर बाहें खोली हसीन सिसकियाँ
छाँव तले कंधे पर सर रखे मुस्कुराती तितलियाँ
उस रंगीन महफ़िल में शामील हुई पेड़-पत्तियाँ
तेरी हसीं की गूँज मे झूम उठी वो शाम हसीन करने 
क्या एक बार फिर मिलोगी?

बिन बोले लफ्जों में सुलगती कहानियाँ
किनारे पर रेत में बिखरी मदहोश मस्तियाँ
तेरे होठों पर मीठे गीतों की सुरीली फुलझड़ियाँ
बारिश की बूंदों में भीगी नर्म-गर्म खामोशियाँ
महकती बाहों मे लिपटे उन अनगिनत पलों को जीने
क्या एक बार फिर मिलोगी?

बाली संग झुमती तेरी नटखट मुस्कान
डाडा की बातें रंग लाये हर शाम
झुल्फों में फसा मेरा खुला आसमान
तेरी गोद में पुरे हो जाये हर अरमान
अनगिनत बेतुकी बचकानी बदमाशियां करने
क्या एक बार फिर मिलोगी?

(अंजना भट्ट की माँ....क्या एक बार फिर मिलोगी? से प्रेरित)